परशुराम अवतार

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परशुराम अवतार

हिन्दू धर्मका अनुसार परशुरामलाई भगवान् विष्णुका 10 मुख्य अवतारहरुम छैठौँ अवतार मानिएको छ। परशुरामसँग परशु (बन्चरो) भएकोले उनको नाम परशुराम भएको मानिन्छ। परशुरामका पिताको नाम ऋषि जमदग्नि र माताको नाम रेणुका थियो। परशुराम एक ऋषिपुत्र भए पनि उनमा क्षत्रीय गुणहरु थिए। परशुरामले 21 पटक पृथ्वीका क्षत्रीहरुको संहार गरेका थिए।

परशुरामको कथा[सम्पादन गर्ने]

परशुरामले शुक्राचार्य, बृहस्पति, ब्रह्माजी र शिवजीसँग प्राचीन कालको धनुर्विद्या सिकोका थिए। परशुराम भगवान् शिवजीलाई आफ्ना परम गुरु मान्थे। परशुरामलाई एक सच्चा पितृ बचन पालन गर्ने मान्छेको रुपमा पनि लिइएको छ। किन भने उनले पिता जमदग्निको आज्ञाअनुसार आफ्नी माता रेणुकाको हत्या गरेका थिए। एक दिन गन्धर्वहरुको जल विहार देखेर रेणुका मोहित भइन् भन्ने कारणले ऋषि जमदग्निले परशुरामलाई उनकी माता रेणुको हत्या गरिदिने आज्ञा दिएका थिए। परशुरामले पनि निस्संकोच पितृ आज्ञा पालन गर्न रेणुकाको गर्धन काटेका थिए। पछि गएर जमदग्निले खुसी हुँदै आफ्नो आज्ञाको पालना गरेकोमा परशुरामलाई मागेअनुसारको बरदान दिने वाचा गरे। तब परशुरामले आफ्नी मरेकी आमाको पुनर्जीवन मागे। यो देखेर जमदग्निले आफ्नो योग शक्तिले रेणुकालाई जीवित गराए। मातृबधको प्रायश्चित्तका लागि परशुरामले बिभिन्न तीर्थहरुको भ्रमण गरेका थिए। परशु राम माता पिताका सच्चा भक्त थिए।

परशुरामले गरेका कामहरु[सम्पादन गर्ने]

कार्तविर्य अर्जुन

एक दिन जमदग्नीको आश्रममा हैहय क्षत्री वंशका कार्तविर्य अर्जुन नाम गरेका राजा आफ्नो सेना सहित आए। ऋषी जमदग्नीले पनि उनिहरुको निको स्वागत गरे। राजा कार्तविर्यका सेनाको स्वागतको लागि चाहिने सबै सामान आश्रमम पालिएकी एक गाईबाट प्राप्त भएको थियो। यो देखेर राजा कार्तविर्यको मनमा ऋषी बाट ति गाई प्राप्त गर्ने विचार आयो। राजाले ऋषीसँग पहिले त गाई मागे तर जमदग्नीले आफ्नो जीवन यापन चलाएकी यी गाई न दिने आग्रह गरे। यो सुनेर राजा कार्तविर्यले आफ्नो सेनालाई गाई लुटेर लिने आदेश दिए।राजाको आज्ञानुशार सेनाले ऋषी जमदग्नीलाई बन्धक बनाएर गाई लुटेर गए। त्यो बेला परशुराम आश्रममा थिएनन्। जब परशुराम आश्रममा आए तब सबै कुराहरु थाहा पाएर राजा कार्तविर्यको राज्यमा गए। राजा कार्तविर्यका हजारवटा हातहरु थिए। परशुरामले राजा कार्तविर्य सँग यूद्ध गरे। परशुरामले राजा कार्तविर्यका हजारवटा हातलाई काटेर दुइटा हातहरु मात्र राखे। अब तँलाई मानव बनाएँ आज देखि दानवता छोडेर मानवतामा परिणत हुनु भनेर आफ्नो गाई लिएर परशुराम आश्रममा फर्किए। भोलि पल्ट परशुराम आश्रममा न भएको मौका पारी राजा कार्तविर्यका छोराहरुले ऋषी जमदग्नीलाई मारेर गाई लिएर गए। परशुराम आश्रममा फर्किए पछि रेणुकाले सबैकुरा भनेर बिलाप गर्न थालिन्। रेणुका छाती पिटेर रुन लागीन्। यो देखेर परशुरामलाई साह्रै रिश उठ्यो जति पटत रेणुकाले छाती पिटेकी छन्। त्यति पटक क्षेत्रीहरुको विनास गर्ने परशुरामले आफ्नी मातालाई बचन दिए। यसरी रुँदा रेणुकाले 21 पटक छाती पिटेकी थिइन्। त्यसैले परशुरामले पनि 21 पटक पृथ्वीमा घुमे सबै क्षेत्रीयहरुको नाश गरे। सबै क्षेत्रीय स्त्रीहरुलाई ब्राह्मणद्वार सन्तानोत्पत्न गराए। यसै गरी परशुरामले पृथ्वी बढेका पापीहरुलाई नष्ट गरेर नयाँ धर्मको स्थापना गरे। त्रेतायुगमा भगवान रामसँगको मिलन पछि परशुरामको तेज रामले आफुमाथी लगेर परशुराम एक सामान्य ऋषीको रुपमा राखिदिएका थिए।[१]

परशुराम राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका र भृगुवंशीय जमदग्नि के पुत्र, विष्णु के अवतार र शिव के परम भक्त थे। इन्हें शिवबाट विशेष परशु प्राप्त हुआ था। इनका नाम तो राम था, किन्तु शंकर द्वारा प्रदत्त अमोघ परशु को सदैव धारण गरिरहने कारण ये परशुराम कहलाते थे। विष्णु के दस अवतारहरु मध्ये छठा अवतार, जो वामन एवं रामचन्द्रको मध्येमा गनिन्छन। जमदग्नि के पुत्र भएको कारण ये 'जामदग्न्य' भी कहे जाते हैं। इनका जन्म अक्षय तृतीया, वैशाख शुक्ल तृतीया को हुआ था। अत: इस दिन व्रत गर्ने र उत्सव मनाउने प्रथा है। परम्परा के अनुसार उनले क्षत्रियों का अनेक बार विनाश किया। क्षत्रियों के अहंकारपूर्ण दमनबाट विश्व को मुक्ति दिलाउन को लागी इनका जन्म हुआ था। परशुरामले शस्त्र विद्या द्रोणाचार्यबाट सीखी थी।

मातृ-पितृ भक्त परशुराम[सम्पादन गर्ने]

उनकी माँ जल का कलश लेकर भर्नको लागी नदी पर गयीं। वहाँ गंधर्व चित्ररथ अप्सराओं के साथ जलक्रीड़ा कर रहा था। उसलाई देख्दा रेणुका इतनी तन्मय हो गयी कि जल ल्याउन विलंब हो गया तथा यज्ञ का समय व्यतीत हो गया। उसकी मानसिक स्थिति समझकर जमदग्निले अपने पुत्रों को उसका वध गर्नको लागी कहा। परशुराम के अतिरिक्त कोई भी ऐसा गर्नको लागी तैयार नहीं हुआ। पिताको आदेश भएपछी परशुरामले माँ का वध कर दिया। पिता के प्रसन्न भएपछी उनले वरदान स्वरूप उनका जीवित होना माँगा।

पिताबाट प्राप्त वरदान[सम्पादन गर्ने]

परशुराम के पिताले क्रोध के आवेशमा पटक पटक अपने चारों बेटों को माँ की हत्या गर्ने आदेश दिया। परशुराम के अतिरिक्त कोई भी तैयार न हुआ। अत: जमदग्निले सबको संज्ञाहीन कर दिया। परशुरामले पिता की आज्ञा मानकर माता का शीश काट डाला। पिताले प्रसन्न होकर वर माग्न भने तब उनले चार वरदान माँगे-

माँ पुनर्जीवित हो जायँ, उनलाई मरेको स्मृति न रहे, भाई चेतना-युक्त हो जायँ और मैं परमायु होऊँ। जमदग्निले उन्हें चारों वरदान दे दिये।

क्रोधी स्वभाव[सम्पादन गर्ने]

दुर्वासा की भाँति ये भी अपने क्रोधी स्वभावको लागी विख्यात है। एक बार कार्तवीर्यले परशुराम की अनुपस्थितिमा आश्रम उजाड़ डाला था, जसबाट परशुरामले क्रोधित हो उसकी सहस्त्र भुजाओं को काट डाला। कार्तवीर्य के सम्बन्धिहरुले प्रतिशोध की भावनाबाट जमदग्नि का वध कर दिया। इस पर परशुरामले 21 बार पृथ्वी को क्षत्रिय-विहीन कर दिया (हर बार हताहत क्षत्रियों की पत्नियाँ जीवित रहीं र नई पीढ़ी को जन्म दिया) र पाँच झीलों को र गत बाट भर दिया। अंतमा पितरों की आकाशवाणी सुनकर उनले क्षत्रिहरुसंग युद्ध करना छोड़कर तपस्या की ओर ध्यान लगाया। रामावतारमा रामचन्द्रद्वारा शिव का धनुष भाचेकोमा ये क्रुद्ध होकर आये थे। उनले परीक्षाको लागी उनका धनुष रामचन्द्र को दिया। जब रामले धनुष चढ़ा दिया तो परशुराम समझ गये कि रामचन्द्र विष्णु के अवतार हैं। इसलिए उनकी वन्दना करके वे तपस्या गर्न चले गये। 'कहि जय जय रघुकुल केतू। भुगुपति गए बनहि तप हेतु॥' यह वर्णन 'राम चरितमानस', प्रथम सोपानमा 267 देखी 284 दोहे तक मिलता है। राम के पराक्रम की परीक्षा

राम का पराक्रम सुनकर वे अयोध्या गये। दशरथले उनके स्वागतार्थ रामचन्द्र को भेजा। उन्हें देखते ही परशुरामले उनके पराक्रम की परीक्षा लेनी चाही। अतः उन्हें क्षत्रियसंहारक दिव्य धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाउनको लागी कहा। राम के ऐसा कर लेने पर उन्हें धनुष पर एक दिव्य बाण चढ़ाकर देखाउनको लागी कहा। रामले वह बाण चढ़ाकर परशुराम के तेज पर छोड़ दिया। बाण उनके तेज को छीनकर पुनः राम के पास लौट आया। रामले परशुराम को दिव्य दृष्टि दी। जसबाट उन्होंने राम के यथार्थ स्वरूप के दर्शन किये। परशुराम एक वर्ष तक लज्जित, तेजहीन तथा अभिमानशून्य होकर तपस्यामा लगे रहे। तदनंतर पितरों बाट प्रेरणा पाकर उन्होंने वधूसर नामक नदी के तीर्थ पर स्नान करके अपना तेज पुनः प्राप्त किया।

परशुराम कुंड[सम्पादन गर्ने]

असम राज्य की उत्तरी-पूर्वी सीमामा जहाँ ब्रह्मपुत्र नदी भारतमा प्रवेश करती है, वहीं परशुराम कुण्ड है, जहाँ तप करके उन्होंने शिवजीबाट परशु प्राप्त किया था। वहीं पर त्यसलाई विसर्जित भी किया। परशुराम जी भी सात चिरंजीवियों मध्ये एक हैं। इनका पाठ गर्नाले दीर्घायु प्राप्त होती है। परशुराम कुंड नामक तीर्थस्थानमा पाँच कुंड बने हुए हैं। परशुराम ने समस्त क्षत्रियों का संहार करके उन कुंडों की स्थापना की थी तथा अपने पितरों बाट वर प्राप्त किया था कि क्षत्रिय संहार के पापबाट मुक्त हो जायेंगे।

रामकथामा परशुराम[सम्पादन गर्ने]

चारों पुत्रों के विवाह के उपरान्त राजा दशरथ अपनी विशाल सेना र पुत्रों के साथ अयोध्या पुरी के लिये चल पड़े। मार्गमा अत्यन्त क्रुद्ध तेजस्वी महात्मा परशुराम मिले। उन्होंने रामसंग कहा कि वे उसकी पराक्रम गाथा सुन चुके हैं, पर राम उनके हाथ का धनुष चढ़ाकर दिखाएँ। तदुपरान्त उनके पराक्रमबाट संतुष्ट होकर वे राम को द्वंद्व युद्धको लागी आमंत्रित करेंगे। दशरथ अनेक प्रयत्नों के उपरान्त भी ब्राह्मणदेव परशुराम को शान्त नहीं कर पाये। परशुराम ने बतलाया कि 'विश्वकर्मा ने अत्यन्त श्रेष्ठ कोटि के दो धनुषों का निर्माण किया था। त्यस मध्ये एक तो देवताओं ने शिव को अर्पित कर दिया था र दूसरा विष्णु को। एक बार देवताओं के यह पूछने पर कि शिव र विष्णु मध्ये कौन बलबान है, कौन निर्बल- ब्रह्मा ने मतभेद स्थापित कर दिया। फलस्वरूप विष्णु की धनुष टंकार के सम्मुख शिव धनुष शिथिल पड़ गया था, अतः पराक्रम की वास्तविक परीक्षा इसी धनुषबाट नै सकती है। शान्त होने पर शिव ने अपना धनुष विदेह वंशज देवरात को र विष्णु ने अपना धनुष भृगुवंशी ऋचीक को धरोहर के रूपमा दिया था, जो कि मेरे पास सुरक्षित है।'

राम ने क्रुद्ध होकर उनके हाथबाट धनुष बाण लेकर चढ़ा दिया र बोले - 'विष्णुबाण व्यर्थ नहीं जा सकता। अब इसका प्रयोग कहाँ पर किया जाये।' परशुराम का बल तत्काल लुप्त हो गया। उनके कथनानुसार राम ने बाण का प्रयोग परशुराम के तपोबल बाट जीते हुए अनेक लोकों पर किया, जो कि नष्ट हो गये। परशुराम ने कहा - 'हे राम, आप निश्चय ही साक्षात विष्णु हैं।' तथा परशुराम ने महेन्द्र पर्वतको लागी प्रस्थान किया। राम आदि अयोध्या की ओर बढ़े। उन्होंने यह धनुष वरुण देव को दे दिया। परशुराम की छोड़ी हुई सेना ने भी राम आदि के साथ प्रस्थान किया।

पिताको आदेश[सम्पादन गर्ने]

नारायणले नै भृगुवंशमा परशुरामका रूपमा अवतार धारण गर्नुभएको थियो। उहाँले जंभासुरको मस्तक विदीर्ण तुल्याउनु भएको थियो। शतदुंदभिलाई बध गर्नुभयो। उहाँले युद्धमा हैहयराज अर्जुनलाई बध गर्नुभएको थियो र केवल धनुषको सहायता लिई सरस्वती नदीको तटमा हजारौं ब्राह्मणवेशका क्षत्रियहरूलाई मार डाला। एक बार कार्तवीर्य अर्जुन ने बाणहरुबाट समुद्र को त्रस्त कर किसी परन्माश गर्नुभएको थियो वीर के विषय में पूछा। समुद्र ने उनलाई परशुरामसंग लड़ने को कहा। परशुराम को उसने अपने व्यवहारबाट बहुत रुष्ट कर दिया। अतः परशुराम ने उसकी हजार भुजाएँ काट डालीं। अनेक क्षत्रिय युद्धको लागी आ जुटे। परशुराम क्षत्रिहरुसंग रुष्ट हो गये, अतः उन्होंने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन कर डाला। अंतमा पितरों की आकाशवाणी सुनकर उन्होंने क्षत्रिहरुसंग युद्ध करना छोड़कर तपस्या की ओर ध्यान लगाया।

वे सौ वर्षों तक सौम नामक विमान पर बैठे हुए शाल्वसंग युद्ध करते रहे किंतु गीत गीत गाती हुई नग्निका (कन्या) कुमारियों को मुखबाट यह सुनकर कि शाल्व का वध प्रद्युम्न र साँब को साथ लेकर विष्णु करेंगे, उन्हें विश्वास हो गया, अतः वे त्यहिदेखी वनमा जाकर अपने अस्त्र शस्त्र इत्यादि पानीमा डुबोकर कृष्णावतार की प्रतीक्षामा तपस्या करने लगे।

परशुराम र यज्ञ[सम्पादन गर्ने]

परशुराम ने अपने जीवनकालमा अनेक यज्ञ किए। यज्ञ गर्नको लागी उन्होंने बत्तीस हाथ ऊँची सोने की वेदी बनवायी थी। महर्षि कश्यप ने दक्षिणमा पृथ्वी सहित उस वेदी को ले लिया तथा फिर परशुरामसंग पृथ्वी छोडेर जानको लागी कहा। परशुराम ने समुद्र पीछे हटाकर गिरिश्रेष्ठ महेंद्र पर निवास किया।

राम र परशुराम[सम्पादन गर्ने]

भृगुनंदन परशुराम क्षत्रियों का नाश गर्नको लागी सदैव तत्पर रहते थे। दशरथ पुत्र राम का पराक्रम सुनकर वे अयोध्या गये। दशरथ ने उनके स्वागतार्थ रामचन्द को भेजा। उन्हें देखते ही परशुराम ने उनके पराक्रम की परीक्षा लेनी चाही। अतः उन्हें क्षत्रिय संहारक दिव्य धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाउनको लागी कहा। राम के ऐसा कर लेने पर उन्हें धनुष पर एक दिव्य बाण चढ़ाकर देखाउनको लागी कहा। राम ने वह बाण चढ़ाकर परशुराम के तेज पर छोड़ दिया। बाण उनके तेज को छीनकर पुनः राम के पास लौट आया। राम ने परशुराम को दिव्य दृष्टि दी। जसबाट उन्होंने राम के यथार्थ स्वरूप के दर्शन किये। परशुराम एक वर्ष तक लज्जित, तेजहीन तथा अभिमानशून्य होकर तपस्यामा लगे रहे। तदनंतर पितरों बाट प्रेरणा पाकर उन्होंने वधूसर नामक नदी के तीर्थ पर स्नान करके अपना तेज पुनः प्राप्त किया।

गाधि र ऋचीक[सम्पादन गर्ने]

गाधि नामक महाबली राजा अपने राज्य का परित्याग करके वनमा चले गये। वहाँ उनकी एक पुत्री हुई जिसका वरण ऋचीक नामक मुनि ने किया। गाधि ने ऋचीकसंग कहा कि कन्या की याचना करते हुए उनके कुलमा एक सहस्र पांडुबर्णी अश्व, जिनके कान एक ओर से काल हों, शुल्क स्वरूप दिये जाते हैं, अतः वे शर्ते पूरी करें। ऋचीक ने वरुण देवताबाट उस प्रकार के एक सहस्र घोड़े प्राप्त कर शुल्कस्वरूप प्रदान किये। गाधि की सत्यवती नामक पुत्री का विवाह ऋतीकसंग हुआ।

जन्म कथा[सम्पादन गर्ने]

भृगु ने अपने पुत्र के विवाह के विषयमा जाना तो बहुत प्रसन्न हुए तथा अपनी पुत्रवधूसंग वर माँगने को कहा। उनसंग सत्यवती ने अपने तथा अपनी माताको लागी पुत्र जन्म की कामना की। भृगु ने उन दोनों को 'चरु' भक्षणार्थ दिये तथा कहा कि ऋतुकाल के उपरान्त स्नान करके सत्यवती गूलर के पेडत्र तथा उसकी माता पीपल के पेड़ का आलिंगन करे तो दोनों को पुत्र प्राप्त होंगे। माँ-बेटी के चरु खादा उलट-फेर हो गयी। दिव्य दृष्टिबाट देखकर भृगु पुनः वहाँ पधारे तथा उन्होंन सत्यवतीसंग कहा कि तुम्हारी माता का पुत्र क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मणोचित व्यवहार करेगा तथा तुम्हारा बेटा ब्राह्मणोचित होकर भी क्षत्रियोचित आचार-विचार वाला होगा। बहुत अनुनय-विनय करने पर भृगु ने मान लिया कि सत्यवती का बेटा ब्राह्मणोचित रहेगा किंतु पोता क्षत्रियों की तरह कार्य करने वाला होगा।

सत्यवती के पुत्र जमदग्नि मुनि हुए। उन्होंने राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुकासंग विवाह किया। रेणुका के पाँच पुत्र हुए—

रुमण्वान, सुषेण, वसु, विश्वावसु तथा पाँचवें पुत्र का नाम परशुराम था। वही क्षत्रियोचित आचार-विचार वाला पुत्र था। एक बार सद्यस्नाता रेणुका राजा चित्ररथ पर मुग्ध हो गयी। उसके आश्रम पहुँचने पर मुनि को दिव्य ज्ञानबाट समस्त घटना ज्ञात हो गयी। उन्होंने क्रोध के आवेशमा पटक पटक अपने चार बेटों को माँ की हत्या करने का आदेश दिया। किंतु कोई भी तैयार नहीं हुआ। जमदग्नि ने अपने चारों पुत्रों को जड़बुद्ध होने का शाप दिया। परशुराम ने तुरन्त पिता की आज्ञा का पालन किया। जमदग्नि ने प्रसन्न होकर उनलाई वर माग्नको लागी कहा। परशुराम ने पहले वरमा माँ का पुनर्जीवन माँगा र फिर अपने भाईयों को क्षमा कर दिनको लागी कहा। जमदग्नि ऋषि ने परशुरामसंग कहा कि वो अमर रहेगा। एक दिन जब परशुराम बाहर गये थे तो कार्तवीर्य अर्जुन उनकी कुटिया पर आये। युद्ध के मदमा उन्होंने रेणुका का अपमान किया तथा उसके बछड़ों का हरण करक चले गये। गाय रंभाती रह गयी। परशुराम को मालूम पड़ा तो क्रुद्ध होकर उन्होंने सहस्रबाहु हैहयराज को मार डाला। हैहयराज के पुत्र ने आश्रम पर धावा बोला तथा परशुराम की अनुपस्थितिमा मुनि जमदग्नि को मार डाला। परशुराम घर पहुँचे तो बहुत दुखी हुए तथा पृथ्वी का क्षत्रियहीन करने का संकल्प किया। अतः परशुराम ने इक्कीस बार पृथ्वी के समस्त क्षत्रियों का संहार किया। समंत पंचक क्षेत्रमा पाँच रुधिर के कुंड भर दिये। क्षत्रियों के रुधिरबाट परशुराम ने अपने पितरों का तर्पण किया। उस समय ऋचीक साक्षात प्रकट हुए तथा उन्होंने परशुराम को ऐसा कार्य गर्न रोका। ऋत्विजों को दक्षिणामा पृथ्वी प्रदान की। ब्राह्मणों ने कश्यप की आज्ञाबाट उस वेदी को खंड-खंड करके बाँट लिया, अतः वे ब्राह्मण जिन्होंने वेदी को परस्पर बाँट लिया था, खांडवायन कहलाये।

कथा: शिव द्वारा दिव्यास्त्र[सम्पादन गर्ने]

बड़े होने पर परशुराम ने शिवाराधन किया। उस नियम का पालन करते हुए उन्होंने शिव को प्रसन्न कर लिया। शिव ने उन्हें दैत्यों का हनन करने की आज्ञा दी। परशुराम ने शत्रुहरुसंग युद्ध किया तथा उनका वध किया। किंतु इस प्रक्रियामा परशुराम का शरीर क्षत-विक्षत हो गया। शिव ने प्रसन्न होकर कहा कि शरीर पर जितने प्रहार हुए हैं, उतना ही अधिक देवदत्व उन्हें प्राप्त होगा। वे मानवेतर होते जायेंगे। तदुपरान्त शिव ने परशुराम को अनेक दिव्यास्त्र प्रदान किये, जसबाट परशुराम ने कर्ण पर प्रसन्न होकर उसलाई दिव्य धनुर्वेद प्रदान किया।

जमदग्नि ऋषि ने रेणुका के गर्भबाट अनेक पुत्र प्राप्त किए। त्यसमध्ये सबभन्दा छोटे परशुराम थे। उन दिनों हैहयवंश का अधिपति अर्जुन था। उसने विष्णु के अंशावतार दत्तात्रेय के वरदानबाट एक सहस्र भुजाएँ प्राप्त की थीं। एक बार नर्मदामा स्नान करते हुए मदोन्मत्त हैहयराज ने अपनी बाहुबाट नदी का वेग रोक लिया, फलतः उसकी धारा उल्टी बहने लगी, जसबाट रावण का शिविर पानीमा डूबने लगा। दशानन ने अर्जुन के पास जाकर उनलाई भला-बुरा कहा तो उसने रावण को पकड़कर कैद कर लिया। पुलस्त्य के कहने पर उसने रावण को मुक्त कर दिया। एक बार वह वनमा जमदग्नि के आश्रम पर पहुँचा। जमदग्नि के पास कामधेनु थी। अतः वे अपरिमित वैभव क भोक्ता थे। ऐसा देखकर हैहयराज सहस्र बाहु अर्जुन ने कामधेनु का अपहरण कर लिया। परशुराम ने फरसा उठाकर उसका पीछा किया तथा युद्धमा उसकी समस्त भुजाएँ तथा सिर काट डाले।

तीर्थाटन[सम्पादन गर्ने]

उसके दस हजार पुत्र भयभीत होकर भाग गये। कामधेनु सहित आश्रम लौटने पर पिता ने उन्हें तीर्थाटन कर अपने पाप पखाल्नको लागी आज्ञा दी क्योंकि उनकी मतिमा ब्राह्मण का धर्म क्षमादान है। परशुराम ने वैसा ही किया। एक वर्ष तक तीर्थ करके वे वापस आये। उनकी माँ जल का कलश लेकर भर्नको लागी नदी पर गयीं। वहाँ गंधर्व चित्ररथ अप्सराओं के साथ जलक्रीड़ा कर रहा था। उनलाई देख्दा रेणुका इतनी तन्मय हो गयी कि जल ल्याउनमा विलंब हो गया तथा यज्ञ का समय व्यतीत हो गया। उसकी मानसिक स्थिति समझकर जमदग्नि ने अपने पुत्रों को उसका वध गर्नको लागी कहा। परशुरामको अतिरिक्त कोहि पनि यस्तो गर्नको लागी तैयार नहीं हुआ। पिताको भनाईमा लागेर परशुराम ने माँ र सब भाइयों का वध कर दिया। पिता के प्रसन्न होने पर उन्होंने वरदानस्वरूप उन सबका जीवित होना माँगा, अतः सब पूर्ववत् जीवित तथा स्वस्थ हो गये। हैहयराज अर्जुन के पुत्र निरंतर बदला लेने का अवसर ढूँढते रहते थे। एक दिन पुत्रों की अनुपस्थितिमा उन्होंने ऋषि जमदग्नि का वध कर दिया। परशुराम ने उन सबको मारकर महिष्मति नगरी मा उनके कटे सिरहरुबाट एक पर्वत का निर्माण किया। उन्होंने अपने पिता को निमित्त बनाकर इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियहीन कर दिया। वास्तवमा परशुराम श्रीविष्णु के अंशावतार थे, जिन्होंने क्षत्रिय नाशको लागी ही जन्म लिया था। उन्होंने अपने पिता के धड़ को सिरसंग जोड़कर यजन द्वारा उन्हें स्मृति रूप सकल्पमय शरीर की प्राप्ति करवा दी।

श्रीमद्भागवत महापुराणमा वर्णन[सम्पादन गर्ने]

रेणुका के गर्भबाट जमदग्नि ऋषि के वसुमान आदि कई पुत्र हुए। त्यसमा सबभन्दा छोटे परशुरामजी थे। उनका यश सारे संसारमा प्रसिद्ध है। कहते हैं कि हैहयवंश का अन्त करने के लिये स्वयं भगवान ने की परशुराम के रूपमा अंशावतार ग्रहण किया था। उन्होंने इस पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियहीन कर दिया। यद्यपि क्षत्रियों ने उनका थोड़ा-सा ही अपराध किया था-फिर भी वे लोग बड़े दुष्ट, ब्राह्मणों के अभक्त, रजोगुणी र विशेष करके तमोगुणी हो रहे थे। यही कारण था कि वे पृथ्वी के भार हो गये थे र इसी के फलस्वरूप भगवान परशुराम ने उनका नाश करके पृथ्वी का भार उतार दिया।

राजा परीक्षित ने पूछा- भगवन! अवश्य ही उस समय के क्षत्रिय विषयलोलुप हो गये थे; परन्तु उन्होंने परशुरामजी का ऐसा कौन-सा अपराध कर दिया, जिसके कारण उन्होंने बार-बार क्षत्रियों के वंश का संहार किया।

श्री शुकदेवजी कहने लगे- परीक्षित! उन दिनों हैहयवंश का अधिपति था अर्जुन। वह एक श्रेष्ठ क्षत्रिय था। उसने अनेकों प्रकार की सेवा-शुश्रूषा करके भगवान नारायण के अंशावतार दत्तात्रेयजी को प्रसन्न कर लिया र उनबाट एक हजार भुजाएँ तथा कोई भी शत्रु युद्धमा पराजित न कर सके- यह वरदान प्राप्त कर लिया। साथ ही इन्द्रियों का अबाध बल, अतुल सम्पत्ति, तेजस्विता, वीरता, कीर्ति र शारीरिक बल भी उसने उनकी कृपाबाट प्राप्त कर लिये थे। वह योगेश्वर हो गया था। त्यसमा ऐसा ऐश्वर्य था कि वह सूक्ष्म-भन्दा-सूक्ष्म, स्थूल-भन्दा-स्थूल रूप धारण कर लेता। सभी सिद्धियाँ उनलाई प्राप्त थीं। वह संसारमा वायु की तरह सब जगह बेरोक-टोक विचरा करता। एक बार गले मा वैजयन्ती माला पहने सहस्त्रबाहु अर्जुन बहुत-सी सुन्दरी स्त्रियों के साथ नर्मदा नदीमा जल-विहार कर रहा था। उस समय मदोन्मत्त सहस्त्रबाहु ने अपनी बाहुबाट नदी का प्रवाह रोक दिया। दशमुख रावण का शिविर पनि त्यहि कतै नजिकैमा नै था। नदी की धारा उलटी बहने लगी, जसबाट उसका शिविर डूबने लगा। रावण अपने को बहुत बड़ा वीर तो मानता ही था, इसलिये सहस्त्रार्जुन का यह पराक्रम उनलाई सहन नहीं हुआ। जब रावण सहस्त्रबाहु अर्जुन के पास जाकर बुरा-भला कहने लगा, तब उसने स्त्रियों के सामने ही खेल-खेलमा रावण को पकड़ लिया र अपनी राजधानी माहिष्मतीमा ले जाकर बंदर के समान कैद कर लिया। पीछे पुलस्त्यजी को भनाईमा लागेर सहस्त्रबाहु ने रावण को छोड़ दिया।

कामधेनुको लागी संघर्ष[सम्पादन गर्ने]

एक दिन सहस्त्रबाहु अर्जुन शिकार खेलने के लिये बड़े घोर जंगलमा निकल गया था। दैववश वह जमदग्नि मुनि के आश्रम पर जा पहुँचा। परम तपस्वी जमदग्नि मुनि के आश्रममा कामधेनु रहती थी। उसके प्रतापबाट उन्होंने सेना, मन्त्री र वाहनों के साथ हैहयाधिपति का देखा कि जमदग्नि मुनि का ऐश्वर्य तो मभन्दा पनि भी बढ़ा-चढ़ा है। इसलिये उसने उनके स्वागत-सत्कार को कुछ भी आदर न देकर कामधेनु को ही ले लेना चाहा। उसने अभिमानवश जमदग्नि मुनिसंग माँगा भी नहीं, अपने सेवकों को आज्ञा दी कि कामधेनु को छीन ले चलो। उसकी आज्ञाबाट उसके सेवक बछड़े के साथ 'बाँ-बाँ' डकराती हुई कामधेनु को बलपूर्वक माहिष्मतीपुरी ले गये। जब वे सब चले गये, तब परशुरामजी आश्रम पर आये र उसकी दुष्टता का वृत्तान्त सुनकर चोट खाये हुए साँप की तरह क्रोधबाट तिलमिला उठे। वे अपना भयंकर फरसा, तरकस, ढाल एवं धनुष लेकर बड़े वेगसंग उसके पीछे दौड़े- जस्तो कोहि कसैसंग न दबने वाला सिंह हाथी पर टूट पड़े।

सहस्त्रबाहु अर्जुन अभी अपने नगरमा प्रवेश कर ही रहा था कि उसने देखा परशुरामजी महाराज बड़े वेगसंग उसी की ओर झपटे आ रहे हैं। उनकी बड़ी विलक्षण झाँकी थी। वे हाथमा धनुष-बाण र फरसा लिये हुए थे, शरीर पर काला मृगचर्म धारण किये हुए थे र उनकी जटाएँ सूर्य की किरणों के समान चमक रही थीं। उन्हें देखते ही उसने गदा, खड्ग बाण, ऋष्टि, शतघ्नी र शक्ति आदि आयुधों बाट सुसज्जित एवं हाथी, घोड़े, रथ तथा पदातियों बाट युक्त अत्यन्त भयंकर सत्रह अक्षौहिणी सेना भेजी। भगवान परशुराम ने कुरै कुरामा अकेले ही उस सारी सेना को नष्ट कर दिया। भगवान परशुरामजी की गति मन र वायु के समान थी। बस, वे शत्रु की सेना काटते ही जा रहे थे। जहाँ-जहाँ वे अपने फरसे का प्रहार करते, वहाँ-वहाँ सारथि र वाहनों के साथ बड़े-बड़े वीरों की बाँहें, जाँघें र कंधे कट-कटकर पृथ्वीपर गिरते जाते थे।

सहस्त्रबाहु अर्जुन का वध[सम्पादन गर्ने]

हैहयाधिपति अर्जुन ने देखा कि मेरी सेना के सैनिक, उनके धनुष, ध्वजाएँ र ढाल भगवान परशुराम के फरसे र बाणहरुबाट कट-कटकर खूनबाट लथपथ रणभूमिमा गिर गये हैं, तब उसलाई बड़ा क्रोध आया र वह स्वयं भिड़ने के लिये आ धमका। उसने एक साथ ही अपनी हजार भुजाहरुबाट पाँच सौ धनुषों पर बाण चढ़ाये र परशुरामजी पर छोड़े। परन्तु परशुराम जी तो समस्त शस्त्रधारियों के शिरोमणि ठहरे। उन्होंने अपने एक धनुषपर छोड़े हुए बाणहरुबाट नै एक साथ सबको काट डाला। अब हैहयाधिपति अपने हातले पहाड़ र पेड़ उखाड़कर बड़े वेगसंग युद्ध भूमिमा परशुरामजी तर्फ झपटा। परन्तु परशुरामजी ने अपनी तीखी धारवाले फरसे बाट बड़ी फुर्ती के साथ उसकी साँपों के समान भुजाओं को काट डाला। जब उसकी बाँहें कट गयीं, तब उन्होंने पहाड़ की चोटी की तरह उसका ऊँचा सिर धड़ से अलग कर दिया। पिता के मर जाने पर उसके दस हजार लड़के डरकर भग गये।

प्रायश्चित[सम्पादन गर्ने]

परीक्षित! विपक्षी वीरों के नाशक परशुरामजी ने बछड़े के साथ कामधेनु लौटा ली। वह बहुत ही दु:खी हो रही थी। उन्होंने उनले अपने आश्रम पर लाकर पिताजी को सौंप दिया। र माहिष्मती मा सहस्त्रबाहु ने तथा उन्होंने जो कुछ किया था, सब अपने पिताजी तथा भाइयों को कह सुनाया। सब कुछ सुनकर जमदग्नि मुनि ने कहा- 'हाय, हाय, परशुराम! तुमने बड़ा पाप किया। राम, राम! तुम बड़े वीर हो; परन्तु सर्वदेवमय नरदेव का तुमने व्यर्थ ही वध किया। बेटा! हमलोग ब्राह्मण हैं। क्षमा के प्रभावबाट नै हम संसारमा पूजनीय हुए हैं। र तो क्या, सबके दादा ब्रह्माजी भी क्षमा के बलबाट नै ब्रह्मपद को प्राप्त हुए हैं। ब्राह्मणों की शोभा क्षमा के द्वारा ही सूर्य की प्रभा के समान चमक उठती है। सर्वशक्तिमान भगवान श्रीहरि भी क्षमावानों पर ही शीघ्र प्रसन्न होते हैं।

बेटा! सार्वभौम राजा का वध ब्राह्मण की हत्या भन्दा पनि बढ़कर है। जाओ, भगवान का स्मरण करते हुए तीर्थों का सेवन करके अपने पापों को धो डालो'।

संदर्भ सामाग्री[सम्पादन गर्ने]

  1. पृष्ठको सबै सामाग्रीहरु सुब्बा होमनाथ केदारनाथ कृत सुक सागरमा आधारीत

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